पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि औद्योगिक संबंध संहिता (IRC), 2020 के अंतर्गत “उद्योग” की परिभाषा की स्वतंत्र रूप से व्याख्या की जानी चाहिए और यह स्वतः 1978 के ऐतिहासिक बैंगलोर जल आपूर्ति निर्णय द्वारा नियंत्रित नहीं होगी।
1978 का बैंगलोर जल आपूर्ति निर्णय
- बैंगलोर जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड बनाम आर. राजप्पा (1978) मामले में सात न्यायाधीशों की पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) के अंतर्गत “उद्योग” की व्यापक व्याख्या अपनाई।
- इस निर्णय में ट्रिपल टेस्ट विकसित किया गया, जिसके अनुसार किसी गतिविधि को उद्योग तब माना जा सकता है, जब उसमें निम्नलिखित तत्व शामिल हों:
- व्यवस्थित एवं संगठित गतिविधि;
- नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग से संचालित गतिविधि;
- मानव की आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति के उद्देश्य से वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन और/या वितरण।
- इस व्यापक व्याख्या के कारण अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और नगरपालिकाओं सहित अनेक प्रतिष्ठान श्रम कानूनों के दायरे में आ गए।
- रक्षा, न्यायपालिका और कानून-प्रवर्तन जैसे मूल संप्रभु कार्यों को सामान्यतः इसके दायरे से बाहर रखा गया।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
- न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(p) के अंतर्गत “उद्योग” का अर्थ स्वयं नई संहिता की भाषा, संरचना और संदर्भ के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।
- IRC के अंतर्गत “उद्योग” शब्द की व्याख्या नए सिरे से की जाएगी।
- 1978 का निर्णय औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत लंबित विवादों को नियंत्रित करता रहेगा। हालांकि, IRC के अंतर्गत “उद्योग” की व्याख्या के लिए यह निर्णय बाध्यकारी आधार के रूप में लागू नहीं होगा।
1978 के निर्णय पर पुनर्विचार क्यों किया गया?
- 1978 के बाद से भारत के श्रम बाजार में व्यापक परिवर्तन हुए हैं, जिनके प्रमुख कारण हैं:
- उदारीकरण और निजीकरण;
- निजी एवं सेवा क्षेत्रों का विस्तार;
- रोजगार एवं कार्य व्यवस्थाओं के बदलते स्वरूप, जिनमें गिग और प्लेटफॉर्म-आधारित कार्य का उदय भी शामिल है;
- मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र-उन्मुख अर्थव्यवस्था से अधिक विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण।
- नए श्रम संहिताओं का उद्देश्य भारत के बिखरे हुए श्रम कानूनों को एकीकृत एवं आधुनिक बनाना था।
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(p) के अनुसार, “उद्योग” शब्द में अब नियोक्ता और श्रमिक के बीच सहयोग से संचालित किसी भी व्यवस्थित गतिविधि को शामिल किया गया है, भले ही उसमें पूंजी का निवेश किया गया हो या लाभ कमाने का उद्देश्य हो अथवा नहीं। इस प्रकार, गैर-लाभकारी और कम-पूंजी वाली गतिविधियाँ भी इसके दायरे में आ सकती हैं।
- श्रमिक-पक्षीय लाभ:
- गैर-लाभकारी और गैर-पूंजी-आधारित संगठनों के कर्मचारियों तक श्रम अधिकारों का विस्तार।
- सुलह अधिकारियों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों के माध्यम से औपचारिक विवाद-निपटान तक व्यापक पहुंच।
- अधिक संख्या में श्रमिकों के लिए सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों का विस्तार।
- नव-समाविष्ट क्षेत्रों के श्रमिकों को वैधानिक लाभ, जैसे सेवा शर्तों में परिवर्तन के लिए नोटिस, छंटनी मुआवजा तथा शिकायत निवारण की व्यवस्था, उपलब्ध कराना।

आगे की राह
- नई व्याख्या को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रम कानूनों में सुधार श्रमिकों के मौलिक श्रम संरक्षण को कमजोर किए बिना औद्योगिक विकास और कार्यस्थल की लचीलेपन को बढ़ावा दे।
- अनिश्चितता को रोकने तथा औद्योगिक शांति बनाए रखने के लिए स्पष्ट विधायी एवं न्यायिक मार्गदर्शन आवश्यक होगा।
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